एक ग़ज़ल

by apoorvmat

अंदर की आवाज़ सी रहती है
वो अनोखे अन्दाज़ सी रहती है

ढूँढता रहता हूँ ज़मीन पे उसको
वो किसी फ़राज़ सी रहती है

उसके ख़त खोले नहीं जाते
वो अनखुली दराज़ सी रहती है

कैसा ये गीत है रात गुनगुनाती
वो अनछुए साज़ सी रहती है

सब मनाते रहते हैं उसको
वो सबसे नाराज़ सी रहती है

मुझे कुछ मालूम नहीं ‘अपूर्व’
ये ज़िन्दगी राज़ सी रहती है

(जून २०२०)